Cyber fraud : 22 दिन। क्या 22 दिन तक किसी को बेवकूफ बनाकर उसको उसी के घर में गिरफ्तार किया जा सकता है? क्या किसी की मनोस्थिति इतनी विकृत की जा सकती है कि वो 22 दिन तक गिरफ्तार रहे, अपनी सारी जमा-पूंजी लूटा दे, इस दौरान किसी से मदद मांगने या अपनी स्थिति बयां करने का मौका मिले तो इतना डरा हुआ हो कि किसी से कुछ कहे तक नहीं।
22 दिनों तक ‘डीजिटल अरेस्ट’
घटना उत्तर प्रदेश के लखनऊ की है। ऐशबाग निवासी 73 वर्षीय रीता भसीन को ‘डीजिटल अरेस्ट’ कर लिया गया। वो भी एक, दो या चार घंटे नहीं, एक, दो या चार दिन भी नहीं। पूरे 22 दिन तक रीता भसीन अपने ही घर में डीजिटल अरेस्ट हो गईं। ये मामला Cyber fraud का है।
22 दिनों में लूटे 70 लाख रूपए
रीता भसीन के साथ पूरे 22 दिन क्या हुआ ये जानते हैं। कैसे साइबर ठगों ने खुद को सीबीआई और क्राइम ब्रांच का अफसर बताकर रीता भसीन से 22 दिनों में 70 लाख रूपए ठग लिए?
रीता भसीन के मुताबिक 20 जून को उन्हें सुनिता नाम की महिला का फोन आया जिसने खुद को क्राइम ब्रांच का अधिकारी बताया। उसने कहा कि उनके बैंक खातों में मौजूद रकम और जेवरात अवैध कमाई हैं। उन पर सीबीआई ने केस दर्ज किया है। उसके बाद विक्रम सिंह नाम के व्यक्ति से बात कराई गई जिसने कहा कि 10 साल की जेल और 10 लाख का जुर्माना तय है। डर के कारण रीता भसीन ने बताए गए बैंक खातों में 56 लाख रूपए ट्रांसफर कर दिए। अभी इतना काफ़ी नहीं था। ठगों ने कहा कि जांच जारी रहेगी। इसलिए रीता भसीन को कहीं जाने या किसी से मिलने की इजाज़त नहीं थी। और लगातार फोन कॉल पर फोन कॉल पर बनी रहें। विडियो कॉल के जरिए नज़र रखी जाने लगी। जब पैसा खत्म हो गया तो उनसे कहा गया कि जेवर गिरवी रखकर रकम भेजो । डर के मारे उन्होंने अपना सोना गिरवी रखकर 14 लाख रूपए और भेज दिए। यानि कुल 70 लाख रूपए।
इस पूरे प्रकरण के दौरान ठगों ने रीता भसीन को चेतावनी दी थी कि फोन काटा या किसी से बात की तो सीधे जेल भेज दी जाओगी। उन्हें कई बार मौका मिला कि वो बैंक मैनेजर से या परिवार वालों से बात कर सकें, लेकिन मानसिक दबाव में उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया। जब रकम खत्म हो गई तो जालसाजों की हिम्मत देखिए, उन्होंने कहा कि किसी परिजन से बात कराओ ताकि बाकी रकम का इंतजाम हो सके। तब रीता भसीन ने अपने देवर से बात कराई और पूरा मामला सामने आया। रीता ने कहा था कि ठगों ने उन्हें आश्वासन दिया था कि सारी रकम जांच के बाद लौटा दी जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। जाने वाला कहां लौटकर आता है और यहां तो मामला पैसों का है। ठगों ने उनसे पासबुक, आधार, पैन कार्ड, बैंक डिटेल्स और सोने की जानकारी भी ले ली। इसके बाद वे साइबर थाने पहुंची और शिकायत दर्ज कराई।
Cyber fraud होता क्या है? कैसे काम करता है?
पहले बटुए से पैसे चुरा लिए जाते थे लेकिन अब लोगों के पास बैंक खाते हैं तो अब बैंक खातों से भी पैसे चुरा लिए जाते हैं और चोरी करने में लोग खुद जाने-अनजाने मदद करते हैं।
दरअसल साइबर अपराध एक संगठित ऑपरेशन है। पुलिस का कहना है कि एक मॉड्यूल फर्जी दस्तावेज़ों के ज़रिए सिम कार्ड की व्यवस्था करता है। दूसरा मॉड्यूल लोगों को— जो अक्सर गरीब और अशिक्षित होते हैं, उन्हें निशाना बनाकर उनका आधार नंबर लेकर उसमें जुड़ा मोबाइल नंबर बदलवाकर उसे अपराधियों के पास मौजूद नंबर से लिंक करवा देता है। इन खातों में ठगी की गई रकम डाली जाती है। ये सभी खाते लगभग ज़ीरो-बैलेंस खाते होते हैं। एक अन्य मॉड्यूल खुद को जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों से जबरन वसूली करता है। इस पूरे गिरोह का सरगना अक्सर विदेश में बैठा होता है।
अपराधी जिन डेटा का दुरुपयोग करते हैं, वे उन्हें कैसे मिलते हैं?
दरअसल सबसे बड़ी खामी यह है कि मोबाइल नंबर और बैंक खातों जैसी जानकारी खरीदी जा सकती है। ऐसे अपराधों का पता लगाना मुश्किल होता है क्योंकि चुराया गया पैसा बहुत तेजी से इधर-उधर किया जाता है। पीड़ित एक जगह होता है, पैसा जिन खातों में भेजा जाता है वे किसी और जगह होते हैं, जबकि इस्तेमाल किया गया मोबाइल फोन किसी और के नाम पर होता है। इससे जांच अधिकारी कई दिशाओं में भटक जाते हैं।
जल्दी से जल्दी पैसे की वापसी सबसे बड़ी चुनौती होती है क्योंकि साइबर अपराध के बाद लगभग एक घंटे तक पैसा वित्तीय चैनल के भीतर ही रहता है। धोखेबाज़ सैकड़ों बैंक खातों के ज़रिए उस पैसे को इधर-उधर ट्रांसफर करते हैं। इसके बाद पैसा नकद निकाल लिया जाता है, या उसे गेमिंग करेंसी या क्रिप्टो करेंसी में बदल दिया जाता है, ऐसे में उसे वापस लाना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
चोरी किए गए पैसों की रिकवरी रेट अब भी बहुत कम है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा स्थापित भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के सीईओ राजेश कुमार के अनुसार, अप्रैल 2021 से दिसंबर 2023 के बीच पीड़ितों की शिकायतों के आधार पर 1,100 करोड़ रुपये की ठगी गई राशि को ब्लॉक किया गया। हालांकि, उसमें से केवल दसवां हिस्सा ही वसूल किया जा सका है।
साइबर अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि लोग अज्ञानता या डर के कारण डिजिटल गिरफ्तारी का शिकार हो जाते हैं।
डिजिटल गिरफ्तारी को रोकने के लिए डिजिटल साक्षरता आवश्यक
डिजिटल गिरफ्तारी के मामलों को रोकने के लिए जन जागरूकता और डिजिटल साक्षरता का बढ़ाया जाना आवश्यक है। और इतना तो जान ही लें कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई चीज़ भारतीय न्याय व्यवस्था, पुलिस व्यवस्था में कहीं नहीं है। कोई अधिकारी, कोई पुलिसकर्मी आपको कॉल करके कभी गिरफ्तार नहीं करेगा। ये बात खुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बताई है। फोन पर अमिताभ बच्चन ने अपनी आवाज़ देकर इस पर जागरूक किया है।
यदि आप इस तरह की घटना का शिकार होते हैं तो अपनी ओर से कम-से-कम ये कारवाई अवश्यय सुनिश्चित करें:
- ठगी का शिकार होते ही तुरंत National Cybercrime Helpline Number 1930 पर काल करें।
- पास के साइबर थाने पहुंचे और पूरी जानकारी दें।
- तुरंत बैंक के खातों को ब्लाक करवाएं।
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