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बढ़ते पुस्तकालय बन रहे चिन्ता का विषय

The Swadharm by The Swadharm
December 31, 2024
in न्यूज़
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बढ़ते पुस्तकालय बन रहे चिन्ता का विषय
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Library: हाल ही में अपने मोहल्ले के आसपास बढ़ते हुए पुस्तकालयों को देखकर मैं सोच में पड़ गया कि क्या सचमुच में लोगों को पुस्तकों का/शिक्षा का महत्व समझ में आने लगा है? इस उत्सुकतावश मैंने भी पुस्तकालय में जाने का फैसला किया।

पुस्तकालय में जाकर पता चला कि यह तो प्रतियोगी परीक्षाओं के सेन्टर मात्र हैं, जहां पर युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने जाते हैं, जहां पर कुछ दैनिक अखबारों, मासिक पत्रिकाओं, ढ़ेर सारे फर्नीचरों और वातानुकूलित कमरों से काम चल जाता है। यहां पर पुस्तकालयों की ख़ास उपलब्धि इनकी पुस्तकों का संग्रह नहीं बल्कि फ्री वाई-फाई है और बैठने की उत्तम व्यवस्था है।

अधिकतर युवा इन पुस्तकालयों में अपने कमरों के माहौल से भागकर आते हैं केवल यह पता करने की उनके मन का माहौल कितना गन्दा हो चुका है। आस-पास के वातावरण में वह कृत्रिम शान्ति के होते हुए भी वह पढ़ने में सफल नहीं हो पाता। जो अपने ऊपर पढ़ने का अधिक दबाव बनाते हुए पाए गए, उन्हें कुछ ही देर में नींद से झूलता हुआ देखा जा सकता था। खोजने पर पता चला कि पुस्तक या पुस्तकालय को लेकर युवाओं के मस्तिष्क में जो गणितीय सूत्र बिठा दिया गया है, उसके कारण पुस्तकालय आज एक व्यवसाय बन गया है। वह सूत्र कुछ इस प्रकार है –पुस्तक = {धन, पद, प्रतिष्ठा, मनोरंजन, गपशप, मोटिवेशन}

इस गणितीय सूत्र के चलते ही युवा विवशतावश पुस्तकों का भार ढोता हुआ दिखाई देगा अन्यथा उसे जीवन का सारा ज्ञान सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर मिल जाता है। क्या जरूरत है 150-300 पेज वाली किताबों को दिनों तक, हफ्तों तक पढ़ने का जब 10 मिनट के वीडियो में चिंटू भईया भी वही ज्ञान बांट रहे हो।

आखिरकार लोगों का समय जो इतना मूल्यवान है, उसे यूं ही किताबों और पुस्तकालयों में क्यों बर्बाद किया जाए। अगर लोग किताबों में ही उलझ गए तो फिर बाकि के जरूरी काम जैसे चाय की दुकानों पर सुट्टेबाजी और बकैती, हुड़दंग, सजना-संवरना, शॉपिंग, बिंज-वॉचिंग और पॉर्नबाजी आदि कब करेंगे? इन्हीं सब से तो दुनिया को देखने समझने की बुद्धि का विकास होगा। फिर जो रस इन सब कामों को करके मिलता है, वह किताबों में कहां मिलेगा?

साथ ही साथ किताबों को पढ़ने में धन और समय दोनों लगाना पड़ेगा। जब फ्री में इतना कुछ उपलब्ध हो, माफ़ करियेगा जब मोबाइल और इन्टरनेट के माध्यम से बिना श्रम किए इतना कुछ मिल रहा हो, तब पुस्तकालय की क्या आवश्यकता? वस्तुतः ऐसी दशा में तो पुस्तकालय घट जाने चाहिए थे, पर हम चालाक लोग हैं, हम पुस्तकालय विलुप्त नहीं होने देंगे, हम उसे खोखला बना देंगे बिलकुल अपने दिमाग़ की तरह।

इन पनप रहे पुस्तकालयों की एक ख़ास बात और होती है, इनमें से अधिकतर बिल्डिंग के तहखानों में या उसके सबसे अनुपयोगी हिस्से में खुली होती हैं, जहां न दिन का प्रकाश पहुंच सके, न ही खुली हवा। ऐसे दमघोटू वातावरण में एक केबिन पर बैठेकर पढ़ने का आनन्द दोगुना हो जाता है। शायद ऐसे स्थान का चुनाव मुनाफे की दृष्टि से या उसके जिन्दा बचे रहने के लिए किया जाता हो। लेकिन कष्टप्रद बात यह है कि कई दफ़े पुस्तकालय को खोजना भुल भुलैया के खेल से कम नही होता है, बिल्डिंग पर साइन बोर्ड है पर पुस्तकालय कहीं नहीं दिख रहा, कई बार आप बिल्डिंग से आगे निकल जायेंगे और आपको पता भी नहीं चलेगा कि यहां पर पुस्तकालय है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 54,856 सार्वजनिक पुस्तकालय हैं, इनकी वृद्धि और क्षय पर कोई प्रामाणिक सर्वेक्षण नहीं है। इनमें से अधिकांश सार्वजनिक पुस्तकालय स्वयंसेवी संगठनों द्वारा प्रबंधित किए जाते थे, और जनता से पर्याप्त वित्तीय सहायता के अभाव में लंबे समय तक जारी नहीं रह सके। संभवतः, स्वयंसेवी संगठन द्वारा शुरू किए गए ऐसे लगभग 50% सार्वजनिक पुस्तकालय एक निश्चित अवधि के बाद बंद हो जाएंगे। केवल वे सार्वजनिक पुस्तकालय जो सार्वजनिक पुस्तकालय विधान या राज्य सरकार द्वारा निरंतर अनुदान-सहायता के माध्यम से समर्थित हैं, कार्य कर रहे हैं। और ऐसे पुस्तकालयों की संख्या बहुत ही कम है। यही हमारे आज़ादी के महोत्सव की असलियत है। हमें यह जानकर आश्चर्य नही होना चाहिए कि हम अभी तक शिक्षा के सूचकांक पर 110वें स्थान क्यों है?

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Tags: librarylibrary businesslibrary factslibrary in hindi
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