Viral Video: सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें महाराष्ट्र के आदिवासी बच्चे बारिश के मौसम में नदी पार करने के लिए ट्यूब (टायर) का सहारा लेते दिखाई दे रहे हैं। बच्चों के चेहरे पर मासूमियत है, लेकिन दृश्य डराने वाला है।
यह वीडियो हाल ही में जुलाई 2025 की शुरुआत में रिकॉर्ड किया गया है, जब मानसून के चलते इन इलाकों में नदियाँ उफान पर हैं। यह घटना पालघर जिले के एक दूरस्थ आदिवासी गांव की बताई जा रही है, जहां आज भी पक्की सड़क या पुल की सुविधा नहीं है। वीडियो में नज़र आने वाले बच्चे स्कूल जाने की कोशिश कर रहे हैं। वे स्थानीय आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। वीडियो को एक स्थानीय शिक्षक या सामाजिक कार्यकर्ता ने रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर साझा किया।
बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने गांव से दूर स्थित स्कूल जाना होता है। लेकिन मानसून में जब रास्ते बंद हो जाते हैं और नदी का पानी बढ़ जाता है, तो उनके पास टायर या लकड़ी की नाव जैसी अस्थायी साधनों का ही सहारा रह जाता है। बच्चे एक बड़े ट्रक टायर पर बैठते हैं, और कोई बड़ा बच्चा या युवा उसे धक्का देकर नदी पार कराता है। यह दृश्य जहां एक तरफ बच्चों की जिद और पढ़ाई के प्रति समर्पण को दिखाता है, वहीं सरकारी उदासीनता पर भी सवाल खड़े करता है।
नंदुरबार और गडचिरोली में कुपोषण बना गंभीर संकट
आदिवासी जिलों जैसे नंदुरबार, गडचिरोली, धुले और ठाणे में 0 से 6 वर्ष के बच्चों में कुपोषण की दर अत्यधिक है। इसके चलते बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है। सरकार की योजनाएं मौजूद हैं, परंतु उनका ज़मीनी क्रियान्वयन बेहद कमजोर है।
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क्या कहती है सरकार?
राज्य सरकार का कहना है कि आदिवासी बच्चों की शिक्षा और पोषण को लेकर कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जैसे कि आश्रम स्कूल, पोषण आहार योजना और साइकिल वितरण योजना। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इन योजनाओं का लाभ सही समय पर नहीं पहुंच पा रहा।
निष्कर्ष
महाराष्ट्र के आदिवासी बच्चों के लिए स्कूल तक का रास्ता केवल भौगोलिक नहीं, सामाजिक और आर्थिक संघर्षों से भरा हुआ है। सड़क, शिक्षा और सुरक्षा – ये तीन बुनियादी जरूरतें आज भी उनके लिए एक सपना बनी हुई हैं। अब समय है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर इन मासूम चेहरों के सपनों को हकीकत में बदलने की दिशा में ठोस कदम उठाएं।
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