Ima Keithal Market History: आमतौर पर हम बाज़ार जाते हैं तो कहीं किसी दुकान पर शायद कोई महिला दुकानदार दिख जाए। यहां तक कि अमूमन ग्राहक भी महिलाएं नहीं होती यदि बात कॉस्मेटिक्स या कपड़ों की न हो तो। पर क्या आपने कभी ऐसा बाज़ार देखा है जो सिर्फ और सिर्फ महिलाओं द्वारा चलाया जाता हो? जी, ऐसा बाज़ार जहां एक भी पुरुष दुकानदार ने हो। अगर नहीं देखा तो चलिए मणिपुर। पिछले कुछ सालों में मणिपुर की छवि एक हिंसाग्रस्त और सांप्रदायिक आधार पर बंटे राज्य के रूप में देखने को मिली है। लेकिन मणिपुर का ये पक्ष इस राज्य को लेकर आपकी धारणाओं को बिल्कुल बदल देगा।
Ima Keithal Market Hhistory
मणिपुर की राजधानी इम्फाल में एक अनोखा बाज़ार है “ इमा कीथल”। इसका मतलब है “माँओं का बाज़ार”। ये बाज़ार सिर्फ शादीशुदा महिलाओं द्वारा चलाया जाता है, और यहां कोई पुरुष दुकानदार नहीं होता। बाज़ार करीब 500 साल पुराना है और माना जाता है कि इसकी शुरुआत 16वीं शताब्दी हुई थी। उस समय मणिपुर में लल्लूप-कबा (बंधुआ मजदूर) नाम की एक प्रथा थी, जिसमें पुरुषों को खेतों में काम करने या युद्ध में भेज दिया जाता था। ऐसे में घर का ज़िम्मेदारी महिलाओं के ऊपर आ गई। वे खेतों में काम करतीं, अनाज उगातीं और उन्हें बेचतीं। इसी कारण एक ऐसा बाज़ार बना जहाँ सिर्फ महिलाएं ही सामान बेचने लगीं।
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इमा कीथल : नारी शक्ति का प्रतीक
जब ब्रिटिश सरकार ने मणिपुर में ज़बरदस्ती अपने आर्थिक सुधार लागू करने चाहे, तो इमा कीथल की महिलाओं ने डटकर विरोध किया। उन्होंने एक आंदोलन शुरू किया जिसे “नुपी लान” यानी “महिलाओं का युद्ध” कहा जाता है। महिलाओं ने सड़कों पर प्रदर्शन किए, रैलियां निकालीं और ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। ये आंदोलन द्वितीय विश्व युद्ध तक चला। इमा कीथल सिर्फ एक बाज़ार नहीं रहा, यह मणिपुर की नारी शक्ति का प्रतीक बन गया।
आजादी के बाद भी, यह जगह सामाजिक मुद्दों पर बातचीत और फैसलों का एक केंद्र बना रहा। पहले जब सूचना के साधन कम थे, तो लोग यहाँ सिर्फ खरीदारी नहीं बल्कि ख़बरें जानने भी आया करते थे। यहाँ की महिलाएं एक स्वयं-सहायता समूह तरह काम करती हैं। जरूरत पड़ने पर वे एक-दूसरे को उधार पैसे भी देती हैं।
मणिपुर की महिलाएं सिर्फ आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी सक्रिय हैं। संकट के समय, शांति की अपीलों में, और समुदाय के फैसलों में भी उनकी भागीदारी रहती है।

अगर आप कभी रात के समय इस बाज़ार में जाएँ, तो बिजली की रोशनी में चमकते चेहरों वाली महिलाएं आपको मंत्रमुग्ध कर देगी। उनकी आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास देखने लायक होती है। यहाँ की महिलाएं पारंपरिक “फनेक” (एक तरह की लुंगी) और ऊपर “इनफी” (एक शॉल) पहनती हैं। सुबह के समय बाजार की भीड़ में एक अलग ही रौनक होती है।
बाज़ार के कहीं एक कोने में महिलाएं बैठकर बात कर रही होती हैं, कभी देर से डिलीवरी आने की शिकायत, तो कभी खराब माल की। इन मुद्दों में हम आमतौर पर पुरूषों को उलझा हुआ देखते हैं। इस बाजार की मुख्य देवी “इमा इमोइनु” मानी जाती हैं जो धन और व्यापार की देवी हैं। महिलाएं उनके मंदिर में जाकर चढ़ावा भी चढ़ाती हैं।
यहाँ पर कारोबार करने की इजाज़त केवल उन्हीं महिलाओं को मिलती है जो विवाहित हों और आधिकारिक रूप से नामांकित की गई हों। किसी महिला को व्यापार का मौका तभी मिलता है जब कोई रिटायर्ड दुकानदार उसे अपनी जगह उत्तराधिकारी के रूप में चुनता है। यह उत्तराधिकारी उसकी बेटी, बहन या कोई करीबी रिश्तेदार हो सकती है।

आज के समय मे इमा कीथल मणिपुर की समानता और प्रगतिशील सोच की एक मिसाल है। मणिपुर भारत के उन राज्यों में है जहाँ महिलाओं की साक्षरता दर सबसे ज़्यादा है। यहाँ का बहुसंख्यक मैतेई समुदाय अपनी परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
साथ ही, इस बाजार में न सिर्फ स्थानीय महिलाएं, बल्कि हिंदी भाषी और अन्य 33 जनजातियों की महिलाएं भी शामिल हैं। इमा कीथल, यानी एक ऐसा बाज़ार जो सिर्फ व्यापार नहीं करता, ये नारीशक्ति, परंपरा, आत्मनिर्भरता और साहस का प्रतीक है।
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